Poem on Periods - बदन से रिसता खून

बदन से रिसता खून – PERIODS || Poetry And Poems ||

Poem on Periods - बदन से रिसता खून

बदन से रिसता खून


जिसके आगे हार जाता सीने में भरा जुनून,

आता जब भी छीन लेता, मेरा सारा सुकून |

रोके से ना रुके, लगा लो रुई या कपडा ऊन,

फिर तोड़ देता है मुझको, मेरे बदन से रिसता खून ||

*

महीने के वो चार दिन, क्यों मैं सबसे अलग होती हूँ,

चलने में भी मौत आये, क्यों इतनी दुखी होती हूँ ?

अरे काश कोई समझाये , क्यों चहरे पे आई धुंध,

क्यों तोड़ देता है मुझको, मेरे बदन से रिसता खून ?

*

क्यों मंदिर मैं नहीं जा सकती, क्यों रसोई नहीं बना सकती,

पीढ़ी दर पीढ़ी चलते ढोंग, क्यों मैं नहीं मिटा सकती ?

जिनके खंजर भी मैं सह गयी, उन्हें क्यों चुभे मेरे नाखून,

क्यों तोड़ देता है मुझको, मेरे बदन से रिसता खून ?

*

चहरे पे हँसी चढ़ा के, दर्द हजार मैं सहती हूँ.

साफ- सुथरा होके भी, गन्दा महसुस मैं करती हूँ |

वृहत मेरे शरीर के, हालात हो जाते न्यून,

जब तोड़ देता है मुझको, मेरे बदन से रिसता खून ||

*

आशा बस एक साथी की, मेरे दर्द को जो अपना समझे,

कभी चॉकलेट, कभी गर्म पानी और प्यार भरी इक गोद रखे |

मेरे सर पे हाथ रख जो कहे,  you’ll be fine soon,

फिर नही तोड़ सकेगा मुझको, मेरे बदन से रिसता खून ||

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