Breakup Mode On - Poetry and Poems

जरा तू चीख़ ले

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वो सो गयी है तेरे दर्द का प्रचार करके,

वक्त रहते तू भी खुद को सुलाना सिख ले |

क्या हुआ जो आज तू घंटो खाली बैठा,

दिलासा देके दिल को तू बहलाना सीख ले ||

***

तेरी लिखी वो नज्में आज एक बंद किताब है,

पलकों में लिए आँसू, क्यों धुँधले ख्वाब तू ले |

और, न जाने कबसे तेरी आवाज कुछ दबी दबी सी है,

क्यों अब भी बैठा शांत , आज जरा तू चीख़ ले ||

***

हाँ चंद लम्हों तक ये दर्द सीने में होगा,

फिर नाराजगी बन वो सर पे सवार होगा |

गर सह एक दिन तो हर दिन की जुदाई ले,

मैं कहता हूँ यार अब इस दर्द से विदाई ले || 

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2 thoughts on “जरा तू चीख़ ले”

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