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मेहनत में क्या कमी रही ?

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मेरी मेहनत में क्या कमी रही,

क्यों आँखों में मेरे नमी रही.

पिंजरें की कड़ी ना तोड़ सकी,

साँसे ऐसी मेरी जमी रही.

*

सोचा नहीं हकदारों को तुम खून के आंसू रूलाओगे,

योग्य अयोग्य का भेद मिटा, धांधली की सीढ़ी चढ़ जाओगे |

और सबकी टांग खींचने वालों तुम खुद कब ऊँचा उठ पाओगे,

चंद पैसों के खातिर कब तक, बच्चों को यूँ मरवाओगे?

*

 कुछ सफल हुए फिर हार गये,

कुछ हद को तोड़ हद पार गये |

तुम एक फैसला बदल के सबको,

जीते जी ही मार गए ||

*

तानों की फिर बौछार हुई,

और फिर से इज्जत तार हुई |

गैरों से फिर भी संभल जाती,

मैं मेरे घर में भी शिकार हुई ||

*

“क्या हुआ तेरे उन सपनों का हम आस लगाए बैठे थे?”

मुँह फेर के वो फिर हँस देते, असल वो घात लगाए बैठे थे |

अब किसी को अपनी शक्ल दिखाना भी न गवारा लगता है,

जी तोड़ की मेहनत हार बनी, कब से दिल को दबाये बेठे थे ||

*

थोड़ी शर्म करो रिश्तेदारों, कब तक मुझको मुर्झाओगे,

मुझसे दूर जाते हो, एक दिन साथ में दिखना चाहोगे |

और मुझे रोता देख के हँसने वालों, ये हँसी तुम्हारी अंतिम है,

जीत का तमाचा जड़ दूंगी, मेरी हार पे हंस न पाओगे ||

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